Sunday, 26 February 2017
भारत माँ के लाडले सपूत श्री वीर सावरकर जी की पुण्यतिथि पर...
वीर सावरकर एक दुर्द्धर्ष क्रन्तिकारी थे। भारत माता के एक ऐसे सपूत जिन्होंने परतंत्रता की बेड़ियों से माँ को आजाद कराने के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
वीर सवरकर लिखित '' 1857 का स्वातंत्र्य समर '' प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे अधिकृत और प्रामाणिक कृति है।
भारत ही नहीं , संभवतः विश्व की यह पहली ऐसी कृति है , जिसे प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित होने का गौरव प्राप्त है।
भगत सिंह समेत न जाने कितने जाने -अनजाने क्रांतिकारियों , भारत माता के वीर सपूतों के लिए यह '' प्रेरक कृति '' बन गयी। क्रांतिकारियों के लिए ''गीता'' बन गयी यह कृति।
1909 में 1857 की क्रांति की 50 वीं वर्षगांठ पड़ी। 1857 की 50 वीं वर्षगांठ को ब्रिटेन ने विजय दिवस के रूप में मनाया . सावरकर के नेतृत्व में भारतीय देशभक्तों ने 10 मई 1857 को
वीर सवरकर लिखित '' 1857 का स्वातंत्र्य समर '' प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे अधिकृत और प्रामाणिक कृति है।
भारत ही नहीं , संभवतः विश्व की यह पहली ऐसी कृति है , जिसे प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित होने का गौरव प्राप्त है।
भगत सिंह समेत न जाने कितने जाने -अनजाने क्रांतिकारियों , भारत माता के वीर सपूतों के लिए यह '' प्रेरक कृति '' बन गयी। क्रांतिकारियों के लिए ''गीता'' बन गयी यह कृति।
1909 में 1857 की क्रांति की 50 वीं वर्षगांठ पड़ी। 1857 की 50 वीं वर्षगांठ को ब्रिटेन ने विजय दिवस के रूप में मनाया . सावरकर के नेतृत्व में भारतीय देशभक्तों ने 10 मई 1857 को
प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की 50 वीं वर्षगांठ धूमधाम से मनाई। ब्रिटेन में पढ़ाई कर रहे भारतीय युवकों ने 1857 की स्मृति में अपनी छाती पर चमकदार बिल्ले लगाये। उपवास रखा , सभाएं की।
भारत के स्वतंत्र होने तक लड़ाई जारी रखने की प्रतिज्ञा ली गयी।
सावरकर के दृढ़ नेतृत्व में भारतीय छात्रों की संकल्प शक्ति के कारण अंग्रेजों को अपने ही घर में भारतीय राष्ट्रवाद के उग्र रूप का साक्षात्कार हुआ।
वीर सावरकर ने गहन अध्ययन और अपूर्व दृष्टि समपन्नता से 1857 के यथार्थ को दुनिया के सामने रखा और एक मामूली सिपाही विद्रोह के साम्राज्यवादी प्रचलन से उठाकर प्रथम भारतीय स्वातन्त्रय समर
के रूप में प्रतिष्ठापित किया। सबसे पहले उन्होंने मराठी में अपनी संघर्ष और शोध -साधना को लिपिबद्ध किया।
सावरकर जी ने लिखा --'' 10 मई , 1857 को शुरू हुआ युद्ध 10 मई 1908 को समाप्त नहीं हुआ है , वह तब तक नहीं रुकेगा जब तक उस लक्ष्य को पूरा करनेवाली कोई अगली 10 मई आएगी। ओ महान शहीदों ! अपने पुत्रों के इस पवित्र संघर्ष में अपनी प्रेरणादायी उपस्थिति से हमारी मदद करो। हमारे प्राणों में भी जादू का वह मन्त्र फूंक दो जिसने तुमको एकता के सूत्र में गूंथ दिया था। ''
(10 मई 1908 को 1857 की क्रांति की वर्षगांठ पर सावरकर ने O Martyrs ! शीर्षक से अंग्रेजी में चार पृष्ठ लम्बे पम्फ्लेट्स की रचना की , जिसका इंडिया हाउस में आयोजित कार्यक्रम में तथा यूरोप व भारत में बड़े पैमाने पर वितरण किया गया। सभी समाचार पत्रों ने उस पम्फ्लेट्स को राजद्रोह और क्रांति की चिंगारी सुलगानेवाला बताया। )
भारत के स्वतंत्र होने तक लड़ाई जारी रखने की प्रतिज्ञा ली गयी।
सावरकर के दृढ़ नेतृत्व में भारतीय छात्रों की संकल्प शक्ति के कारण अंग्रेजों को अपने ही घर में भारतीय राष्ट्रवाद के उग्र रूप का साक्षात्कार हुआ।
वीर सावरकर ने गहन अध्ययन और अपूर्व दृष्टि समपन्नता से 1857 के यथार्थ को दुनिया के सामने रखा और एक मामूली सिपाही विद्रोह के साम्राज्यवादी प्रचलन से उठाकर प्रथम भारतीय स्वातन्त्रय समर
के रूप में प्रतिष्ठापित किया। सबसे पहले उन्होंने मराठी में अपनी संघर्ष और शोध -साधना को लिपिबद्ध किया।
सावरकर जी ने लिखा --'' 10 मई , 1857 को शुरू हुआ युद्ध 10 मई 1908 को समाप्त नहीं हुआ है , वह तब तक नहीं रुकेगा जब तक उस लक्ष्य को पूरा करनेवाली कोई अगली 10 मई आएगी। ओ महान शहीदों ! अपने पुत्रों के इस पवित्र संघर्ष में अपनी प्रेरणादायी उपस्थिति से हमारी मदद करो। हमारे प्राणों में भी जादू का वह मन्त्र फूंक दो जिसने तुमको एकता के सूत्र में गूंथ दिया था। ''
(10 मई 1908 को 1857 की क्रांति की वर्षगांठ पर सावरकर ने O Martyrs ! शीर्षक से अंग्रेजी में चार पृष्ठ लम्बे पम्फ्लेट्स की रचना की , जिसका इंडिया हाउस में आयोजित कार्यक्रम में तथा यूरोप व भारत में बड़े पैमाने पर वितरण किया गया। सभी समाचार पत्रों ने उस पम्फ्लेट्स को राजद्रोह और क्रांति की चिंगारी सुलगानेवाला बताया। )
वीर सावरकर द्वारा लिखित '' 1857 का स्वातंत्र्य समर '' ने भारत माता के महान सपूत शहीद भगत सिंह को बहुत अधिक प्रभावित किया था। इस ग्रन्थ का एक संस्करण भगत सिंह के क्रांतिकारी दल ने प्रकाशित किया।
आजाद हिन्द फ़ौज के गठन में भी '' 1857 का स्वातंत्र्य समर '' की अहम भूमिका रही। रासबिहारी बोस जैसे महान क्रांतिकारी सावरकर को अपना गुरु मानते थे। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी उनके प्रति श्रद्धा रखते थे।
आजाद हिन्द फ़ौज के गठन में भी '' 1857 का स्वातंत्र्य समर '' की अहम भूमिका रही। रासबिहारी बोस जैसे महान क्रांतिकारी सावरकर को अपना गुरु मानते थे। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी उनके प्रति श्रद्धा रखते थे।
वीर सावरकर
भारत की स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्षों के इतिहास में भारत माता के वीर सपूत सावरकर का नाम बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। उनका पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था। महान देशभक्त और क्रांतिकारी सावरकर ने अपना संपूर्ण जीवन देश की सेवा में समर्पित कर दिया। अपने राष्ट्रवादी विचारों के कारण जहाँ सावरकर देश को स्वतंत्र कराने के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहे, वहीं देश की स्वतंत्रता के बाद भी उनका जीवन संघर्षों से घिरा रहा।
वीर सावरकर का जन्म महाराष्ट्र में नासिक जिले के भागुर नामक गाँव में हुआ था। वर्ष 1883 में जन्में सावरकर तीन भाइयों में मंझले थे। उनके बड़े भाई का नाम नारायण दामोदर सावरकर था। सावरकर के माता-पिता अत्यन्त धार्मिक विचारों वाले ब्राह्मण दम्पत्ति थे। परिवार के धार्मिक वातावरण का प्रभाव तीनों सावरकर भाइयों पर पड़ा। भारत के महापुरुषों की कथाएँ सुनकर बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर महाराष्ट्र की धार्मिक तथा राष्ट्रवादी गतिविधियों में भाग लेने लगे थे।
वीर सावरकर की प्रारम्भिक शिक्षा उनके गाँव की प्राइमरी पाठशाला में हुई। इसके पश्चात् वह बम्बई में शिक्षा प्राप्त करने लगे। एक तरफ जो देश अंग्रेजी शासन की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा उसके अत्याचारों से त्रस्त था, दूसरी ओर अनेक देशभक्त क्राँतिकारी देश को स्वतंत्र कराने के लिए आन्दोलन कर रहे थे। बड़े भाई गणेश जो कि पहले से ही इन गतिविधियों से जुड़े थे, उन्हीं के प्रभाव से वीर सावरकर में देश-प्रेम और क्राँतिकारी की भावना जागृत हो उठी।
वीर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 में महाराष्ट्र के नासिक जिले के भागुर गांव में हुआ था। उनकी माता का नाम राधाबाई सावरकर और पिता दामोदर पंत सावरकर थे। उनके माता-पिता राधाबाई और दामोदर पंत की चार संतानें थीं। वीर सावरकर के तीन भाई और एक बहन भी थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नासिक के शिवाजी स्कूल से हुयी थी। मात्र 9 साल की उम्र में हैजा बीमारी से उनकी मां का देहांत होगया। उसके कुछ वर्ष उपरांत उनके पिता का भी वर्ष 1899 में प्लेग की महामारी में स्वर्गवास हो गया। इसके बाद उनके बड़े भाई ने परिवार के भरण-पोषण का भार संभाला। सावरकर बचपन से ही बागी प्रवित्ति के थे। जब वे ग्यारह वर्ष के थे तभी उन्होंने ̔वानर सेना ̕नाम का समूह बनाया था। वे हाई स्कूल के दौरान बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरू किए गए ̔शिवाजी उत्सव ̕और ̔गणेश उत्सव ̕आयोजित किया करते थे। बाल गंगाधर तिलक को ही सवारकर अपना गुरु मानते थे। वर्ष 1901 मार्च में उनका विवाह ̔यमुनाबाई ̕ से हो गया था। वर्ष 1902 में उन्होंने स्नातक के लिए पुणे के ̔फग्र्युसन कॉलेज में दाखिला लिया। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण उनके स्नातक की शिक्षा का खर्च उनके ससुर यानी यमुनाबाई के पिता ने उठाया।
राजनैतिक गतिविधियाँ
पुणे में उन्होंने ̔अभिनव भारत सोसाइटी ̕का गठन किया और बाद में स्वदेशी आंदोलन का भी हिस्सा बने। कुछ समय बाद वह बाल गंगाधर तिलक के साथ ̔स्वराज दल ̕में शामिल हो गए। उनके राष्ट्र भक्ति से ओप-प्रोत भाषण और स्वतंत्रता आंदोलन के गतिविधियों के कारण अंग्रेज सरकारने उनकी ग्रेजुएशन (स्नातक) की डिग्री ज़ब्त कर ली थी। वर्ष 1906 जून में बैरिस्टर बनने के लिए वे इंग्लैंड चले गए और वहां भारतीय छात्रों को भारत में हो रहे ब्रिटिश शासन के विरोध में संघर्ष के लिए एक जुट किया। उन्होंने वहीं पर ̔आजाद भारत सोसाइटी का गठन किया। सावरकर ने अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने के लिए हथियारों के इस्तेमाल की वकालत की थी और इंग्लैंड में ही हथियारों से लैस एक दल तैयार किया था। सावरकर द्वारा लिखे गए लेख ̔इंडियन’ और ̔तलवार’̕ नामक पत्रिका में प्रकाशित होते थे। वे ऐसे लेखक थे जिनकी रचना के प्रकाशित होने के पहले ही प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसी दौरान उनकी पुस्तक ̔द इंडियन वार ऑफ़ इंडिपेंडेंस 1857’ तैयार हो चुकी थी परंतु ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटेन और भारत में उसके प्रकाशित होने पर रोक लगा दी। कुछ समय बाद उनकी रचना मैडम भीकाजी की मदद से हॉलैंड में गुपचुप तरीके से प्रकाशित हुयी और इसकी प्रतियां फ्रांस पहुंची और फिर भारत भी पहुंचा दी गयीं। सावरकर ने इस पुस्तक में 1857 के ̔सिपाही विद्रोह' को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ स्वतंत्रता की पहली लड़ाई बताया था।
वर्ष 1909 में मदनलाल धिंगरा, सावरकर के सहयोगी, ने वायसराय, लार्ड कर्जन पर असफल हत्या के प्रयास के बाद सर विएली को गोली मार दी। उसी दौरान नासिक के तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर ए.एम.टी जैक्सन की भी गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। इस हत्या के बाद सावरकर पूरी तरह ब्रिटिश सरकार के चंगुल में फंस चुके थे। उसी दौरान सावरकर को 13 मार्च 1910 को लंदन में कैद कर लिया गया। अदालत में उनपर गंभीर आरोप लगाये गए, और 50 साल की सजा सुनाई गयी। उनको काला पानी की सज़ा देकर अंडमान के सेलुलर जेलभेज दिया गया और लगभग 14 साल के बाद रिहा कर दिया गया। वहां पर उन्होंने कील और कोयले से कविताएं लिखीं और उनको याद कर लिया था। दस हजार पंक्तियों की कविता को जेल से छूटने के बाद उन्होंने दोबारा लिखा।
वर्ष 1920 में महात्मा गाँधी, विट्ठलभाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक ने सावरकर को रिहा करने की मांग की। 2 मई 1921 में उनको रत्नागिरी जेल भेजा गया और वहां से सावरकर को यरवदा जेल भेज दिया गया। रत्नागिरी जेल में उन्होंने ̔हिंदुत्व पुस्तक ̕की रचना की। वर्ष 1924 में उनको रिहाई मिली मगर रिहाई की शर्तों के अनुसार उनको न तो रत्नागिरी से बाहर जाने की अनुमति थी और न ही वह पांच साल तक कोई राजनीति कार्य कर सकते थे। रिहा होने के बाद उन्होंने 23 जनवरी 1924 को ̔रत्नागिरी हिंदू सभा’ का गठन किया और भारतीय संस्कृति और समाज कल्याण के लिए काम करना शुरू किया। थोड़े समय बाद सावरकर तिलक की स्वराज पार्टी में शामिल हो गए और बाद में हिंदू महासभा नाम की एक अलग पार्टी बना ली। वर्ष 1937 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और आगे जाकर भारत छोड़ो आंदोलन’ ̕का हिस्सा भी बने।
वीर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 में महाराष्ट्र के नासिक जिले के भागुर गांव में हुआ था। उनकी माता का नाम राधाबाई सावरकर और पिता दामोदर पंत सावरकर थे। उनके माता-पिता राधाबाई और दामोदर पंत की चार संतानें थीं। वीर सावरकर के तीन भाई और एक बहन भी थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नासिक के शिवाजी स्कूल से हुयी थी। मात्र 9 साल की उम्र में हैजा बीमारी से उनकी मां का देहांत होगया। उसके कुछ वर्ष उपरांत उनके पिता का भी वर्ष 1899 में प्लेग की महामारी में स्वर्गवास हो गया। इसके बाद उनके बड़े भाई ने परिवार के भरण-पोषण का भार संभाला। सावरकर बचपन से ही बागी प्रवित्ति के थे। जब वे ग्यारह वर्ष के थे तभी उन्होंने ̔वानर सेना ̕नाम का समूह बनाया था। वे हाई स्कूल के दौरान बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरू किए गए ̔शिवाजी उत्सव ̕और ̔गणेश उत्सव ̕आयोजित किया करते थे। बाल गंगाधर तिलक को ही सवारकर अपना गुरु मानते थे। वर्ष 1901 मार्च में उनका विवाह ̔यमुनाबाई ̕ से हो गया था। वर्ष 1902 में उन्होंने स्नातक के लिए पुणे के ̔फग्र्युसन कॉलेज में दाखिला लिया। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण उनके स्नातक की शिक्षा का खर्च उनके ससुर यानी यमुनाबाई के पिता ने उठाया।
राजनैतिक गतिविधियाँ
पुणे में उन्होंने ̔अभिनव भारत सोसाइटी ̕का गठन किया और बाद में स्वदेशी आंदोलन का भी हिस्सा बने। कुछ समय बाद वह बाल गंगाधर तिलक के साथ ̔स्वराज दल ̕में शामिल हो गए। उनके राष्ट्र भक्ति से ओप-प्रोत भाषण और स्वतंत्रता आंदोलन के गतिविधियों के कारण अंग्रेज सरकारने उनकी ग्रेजुएशन (स्नातक) की डिग्री ज़ब्त कर ली थी। वर्ष 1906 जून में बैरिस्टर बनने के लिए वे इंग्लैंड चले गए और वहां भारतीय छात्रों को भारत में हो रहे ब्रिटिश शासन के विरोध में संघर्ष के लिए एक जुट किया। उन्होंने वहीं पर ̔आजाद भारत सोसाइटी का गठन किया। सावरकर ने अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने के लिए हथियारों के इस्तेमाल की वकालत की थी और इंग्लैंड में ही हथियारों से लैस एक दल तैयार किया था। सावरकर द्वारा लिखे गए लेख ̔इंडियन’ और ̔तलवार’̕ नामक पत्रिका में प्रकाशित होते थे। वे ऐसे लेखक थे जिनकी रचना के प्रकाशित होने के पहले ही प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसी दौरान उनकी पुस्तक ̔द इंडियन वार ऑफ़ इंडिपेंडेंस 1857’ तैयार हो चुकी थी परंतु ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटेन और भारत में उसके प्रकाशित होने पर रोक लगा दी। कुछ समय बाद उनकी रचना मैडम भीकाजी की मदद से हॉलैंड में गुपचुप तरीके से प्रकाशित हुयी और इसकी प्रतियां फ्रांस पहुंची और फिर भारत भी पहुंचा दी गयीं। सावरकर ने इस पुस्तक में 1857 के ̔सिपाही विद्रोह' को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ स्वतंत्रता की पहली लड़ाई बताया था।
वर्ष 1909 में मदनलाल धिंगरा, सावरकर के सहयोगी, ने वायसराय, लार्ड कर्जन पर असफल हत्या के प्रयास के बाद सर विएली को गोली मार दी। उसी दौरान नासिक के तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर ए.एम.टी जैक्सन की भी गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। इस हत्या के बाद सावरकर पूरी तरह ब्रिटिश सरकार के चंगुल में फंस चुके थे। उसी दौरान सावरकर को 13 मार्च 1910 को लंदन में कैद कर लिया गया। अदालत में उनपर गंभीर आरोप लगाये गए, और 50 साल की सजा सुनाई गयी। उनको काला पानी की सज़ा देकर अंडमान के सेलुलर जेलभेज दिया गया और लगभग 14 साल के बाद रिहा कर दिया गया। वहां पर उन्होंने कील और कोयले से कविताएं लिखीं और उनको याद कर लिया था। दस हजार पंक्तियों की कविता को जेल से छूटने के बाद उन्होंने दोबारा लिखा।
वर्ष 1920 में महात्मा गाँधी, विट्ठलभाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक ने सावरकर को रिहा करने की मांग की। 2 मई 1921 में उनको रत्नागिरी जेल भेजा गया और वहां से सावरकर को यरवदा जेल भेज दिया गया। रत्नागिरी जेल में उन्होंने ̔हिंदुत्व पुस्तक ̕की रचना की। वर्ष 1924 में उनको रिहाई मिली मगर रिहाई की शर्तों के अनुसार उनको न तो रत्नागिरी से बाहर जाने की अनुमति थी और न ही वह पांच साल तक कोई राजनीति कार्य कर सकते थे। रिहा होने के बाद उन्होंने 23 जनवरी 1924 को ̔रत्नागिरी हिंदू सभा’ का गठन किया और भारतीय संस्कृति और समाज कल्याण के लिए काम करना शुरू किया। थोड़े समय बाद सावरकर तिलक की स्वराज पार्टी में शामिल हो गए और बाद में हिंदू महासभा नाम की एक अलग पार्टी बना ली। वर्ष 1937 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और आगे जाकर भारत छोड़ो आंदोलन’ ̕का हिस्सा भी बने।
सावरकर वे पहले कवि थे, जिसने कलम-काग़ज़ के बिना जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से कवितायें लिखीं। कहा जाता है उन्होंने अपनी रची दस हज़ार से भी अधिक पंक्तियों को प्राचीन वैदिक साधना के अनुरूप वर्षोंस्मृति में सुरक्षित रखा, जब तक वह किसी न किसी तरह देशवासियों तक नहीं पहुच गई। ---भारत कोश से साभार।
ग्रंथों की रचना
उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की, जिनमें ‘भारतीय स्वातंत्र्य युद्ध’, मेरा आजीवन कारावास’ और ‘अण्डमान की प्रतिध्वनियाँ’ (सभी अंग्रेज़ी में) अधिक प्रसिद्ध हैं। जेल में 'हिंदुत्व' पर शोध ग्रंथ लिखा। 1909 में लिखी पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस-1857' में सावरकर ने इस लड़ाई को ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ आज़ादी की पहली लड़ाई घोषित की थी।
उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की, जिनमें ‘भारतीय स्वातंत्र्य युद्ध’, मेरा आजीवन कारावास’ और ‘अण्डमान की प्रतिध्वनियाँ’ (सभी अंग्रेज़ी में) अधिक प्रसिद्ध हैं। जेल में 'हिंदुत्व' पर शोध ग्रंथ लिखा। 1909 में लिखी पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस-1857' में सावरकर ने इस लड़ाई को ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ आज़ादी की पहली लड़ाई घोषित की थी।
भारत माँ के इस लाडले सपूत की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि कोटि नमन - बलप्रदा परिवार
#वीर_सावरकर #बलप्रदा #BalpradaThursday, 16 February 2017
बेल (फल) विभिन्न रोगों में सहायक
► बालों या सिर में जूं :
• बेल के पके हुए फल के आधे कटोरी जैसे छिलके को साफकर उसमें तिल का तेल और कपूर मिलाकर दूसरे भाग से ढककर रखने से तेल को सिर में लगाने से सिर में जूं नहीं रहती हैं।
► संग्रहणी (दस्त, पेचिश) :
• 10 ग्राम बेल की गिरी का चूर्ण, 6-6 ग्राम सौंठ का चूर्ण और पुराने गुड़ को पीसकर दिन में 3-4 बार छाछ के साथ 3 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से पेचिश के रोग में लाभ मिलता है। खाने में केवल छाछ का ही प्रयोग करें।
• 10 से 20 ग्राम बेल की गिरी और कुड़ाछाल का चूर्ण बनाकर रात के समय 150 मिलीलीटर पानी में भिगोकर, सुबह पानी में पीसकर छानकर रोगी को पिलाने से पेचिश का रोग ठीक हो जाता है।
• 10 से 20 ग्राम कच्ची बेल को आग में सेंककर उसके गूदे में थोड़ी चीनी और शहद मिलाकर पिलाने से पेचिश के रोग में आराम आता है।
• कच्चे बेल का गूदा तथा सोंठ के चूर्ण को बराबर मात्रा में लेकर मिला लें। इस चूर्ण में दुगुना पुराना गुड़ डालकर लुगदी बना लें। इसके सेवन करने के बाद ऊपर से मट्ठा (लस्सी) पी लें। इससे संग्रहणी (दस्त) का रोग दूर हो जाता है।
• बेलगिरी, नागरमोथा, इन्द्रजौ, सुगंधबाला तथा मोचरस इन सभी को बकरी के दूध में डालकर पका लें। इसको छानकर पीने से संग्रहणी (दस्त) मिट जाता है।
• पके हुए बेल का शर्बत पुराने आंव की महाऔषधि है। इसके सेवन से बहुत जल्द ही संग्रहणी (दस्त) का रोग दूर हो जाता है।
• बेल (बेलपत्थर) का शर्बत बनाकर सेवन करने से संग्रहणी (दस्त) रोग ठीक हो जाता है।
• बेलगिरी, गोचरस, नेत्रबाला, नागरमोथा, इन्द्रयव, कूट की छाल सभी को लेकर पीसकर कपड़े में छान लें। इसको खाने से संग्रहणी (दस्त) के रोगी का रोग दूर हो जाता है।
► प्रवाहिका (पेचिश, संग्रहणी) :
• कच्ची बेल का गूदा, गुड़, तिल, तेल, पिप्पली, सौंठ आदि को बराबर मात्रा में मिलाकर मिश्रण तैयार करें। प्रवाहिका में जब पेट में गैस का दर्द हो और बार-बार मलत्याग की इच्छा हो और मल पूरा न होकर थोड़ा-थोड़ा आंव सहित आये तब 10-20 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम इस मिश्रण का प्रयोग करें। इससे लाभ होता है।
• बेल की गिरी और तिल को बराबर मात्रा में लेकर मिश्रण बनाकर, दही की मलाई या घी के साथ सेवन करने से प्रवाहिका रोग में लाभ होता है।
• 3 ग्राम कच्चे फल की मज्जा का चूर्ण तथा 2 ग्राम तिल को दिन में 2 बार पानी के साथ लेने से प्रवाहिका रोग में लाभ मिलता है।
13. बाल रोग : 5 से 10 मिलीलीटर कच्चे फलों की मज्जा तथा आंवले की गुठली के काढ़े को दिन में 3 बार सेवन करने से बालरोगों में लाभ मिलता है।
► आमातिसार :
• बेल के कच्चे और साबूत के फल को गर्म राख में भूनकर, उसको छिलके सहित पीसकर इसके रस को निकालकर इसमें मिश्री मिलाकर दिन में एक या दो बार लगातार 10-15 दिन तक सेवन सेवन करने से पुराना अतिसार (दस्त) ठीक हो जाता है।
• बेल की गिरी, कत्था, आम की गुठली की मींगी, ईसबगोल की भूसी और बादाम की मींगी को बराबर मात्रा में मिलाकर चीनी या मिश्री के साथ रोजाना 3-4 चम्मच सेवन करने से पुराने दस्त, आमातिसार तथा प्रवाहिका के रोग में लाभ मिलता है।
• बेल की गिरी और आम की गुठली की मींगी को बराबर मात्रा में पीसकर 2 से 4 ग्राम तक चावल के पानी के साथ या ठंडे पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से अतिसार (दस्त) ठीक हो जाता है।
• बेल (बेलपत्थर) का शर्बत रोजाना सुबह-शाम पीने से आमातिसार के रोग में लाभ मिलता है। बेल पत्थर के शर्बत में चीनी मिलाकर भी पीने से भी यह रोग दूर होता है।
• आमातिसार (आंवदस्त) के रोगी को बेल पत्थर के रस में, दही की मलाई, तिल का तेल और घी मिलाकर रोजाना सेवन कराने से जल्द आराम मिलता है।
► खूनी दस्त :
• 50 ग्राम बेल की गिरी के गूदे को 20 ग्राम गुड़ के साथ दिन में 3 बार खाने से खूनी अतिसार (दस्त) कम होता जाता है।
• चावल के 20 ग्राम पानी में 2 ग्राम बेल की गिरी का चूर्ण और 1 ग्राम मुलेठी के चूर्ण को पीसकर उसमें 3-3 ग्राम तिल, चीनी, और शहद को मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन कराने से पित्त रक्तातिसार मिट जाता है।
• 1-1 भाग बेल की गिरी और धनियां, 2 भाग मिश्री को एक साथ पीसकर चूर्ण बनाकर 2 से 6 ग्राम तक ताजे पानी से सुबह-शाम सेवन करने से लाभ मिलता है।
• कच्चे बेल को कंड़े की आग में भूनें, जब छिलका बिल्कुल काला हो जाये तब भीतर का गूदा निकालकर 10-20 ग्राम तक दिन में 3 बार मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से खूनी अतिसार ठीक हो जाता है।
• बेल के कच्चे फल को भूनकर या कच्चे फल को सुखाकर रोजाना सेवन करने से धीरे-धीरे खून कम होकर रक्तातिसार (खूनी दस्त) दूर हो जाता है।
• बेल के गूदे को गुड़ को मिलाकर सेवन करने से रक्तातिसार (खूनी दस्त) के रोगी का रोग दूर हो जाता है।
• बेलगिरी में गुड़ मिलाकर गोली बनाकर खाने से खूनी दस्त (रक्तातिसार) बंद हो जाते हैं।
► अतिसार (दस्त) :
• बेल के कच्चे फल को आग में सेंक लें, इसके 10-20 ग्राम गूदे को मिश्री के साथ दिन में 3-4 बार सेवन करने से अतिसार और आमातिसार कम होता है।
• 50 ग्राम सूखी बेल की गिरी और 20 ग्राम श्वेत कत्था के बारीक चूर्ण में 100 ग्राम मिश्री को मिलाकर लगभग डेढ़ ग्राम की मात्रा में दिन में 3-4 बार सेवन करने से सभी प्रकार के अतिसारों में लाभ मिलता है।
• 200 ग्राम बेल की गिरी को 4 लीटर पानी में पका लें। पकने पर जब एक लीटर के लगभग पानी बाकी रह जाए तब इस पानी को छान लें। फिर इसमें लगभग 100 ग्राम मिश्री मिलाकर बोतल में भरकर रख लें। इसको 10 से 20 ग्राम की मात्रा में 500 मिलीग्राम भुनी हुई सोंठ, अत्यधिक तेज अतिसार हो तो मूंग बराबर अफीम मिलाकर सेवन करने से 2-3 बार में लाभ होता है।
• 10 ग्राम बेल की गिरी के पाउडर को चावल के पानी के साथ पीसकर इसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर दिन में 2-3 बार देने से गर्भवती स्त्री का अतिसार (दस्त) ठीक हो जाता है।
• 5 ग्राम बेल की गिरी को सौंफ के रस में घिसकर दिन में 3-4 बार बच्चे को देने से बच्चे के हरे पीले दस्त ठीक हो जाते हैं।
• 1-1 ग्राम बेल की गिरी व पलाश का गोंद और 2 ग्राम मिश्री को मिलाकर थोड़े पानी के साथ पीसकर कम आग पर गाढ़ा करके चटाने से भी अतिसार में लाभ होता है।
► पित्त अतिसार :
बेल का मुरब्बा खिलाने से पित्त का अतिसार मिट जाता हैं। पेट के सभी रोगों में बेल का मुरब्बा खाने से लाभ मिलता है।
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• बेल के पके हुए फल के आधे कटोरी जैसे छिलके को साफकर उसमें तिल का तेल और कपूर मिलाकर दूसरे भाग से ढककर रखने से तेल को सिर में लगाने से सिर में जूं नहीं रहती हैं।
► संग्रहणी (दस्त, पेचिश) :
• 10 ग्राम बेल की गिरी का चूर्ण, 6-6 ग्राम सौंठ का चूर्ण और पुराने गुड़ को पीसकर दिन में 3-4 बार छाछ के साथ 3 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से पेचिश के रोग में लाभ मिलता है। खाने में केवल छाछ का ही प्रयोग करें।
• 10 से 20 ग्राम बेल की गिरी और कुड़ाछाल का चूर्ण बनाकर रात के समय 150 मिलीलीटर पानी में भिगोकर, सुबह पानी में पीसकर छानकर रोगी को पिलाने से पेचिश का रोग ठीक हो जाता है।
• 10 से 20 ग्राम कच्ची बेल को आग में सेंककर उसके गूदे में थोड़ी चीनी और शहद मिलाकर पिलाने से पेचिश के रोग में आराम आता है।
• कच्चे बेल का गूदा तथा सोंठ के चूर्ण को बराबर मात्रा में लेकर मिला लें। इस चूर्ण में दुगुना पुराना गुड़ डालकर लुगदी बना लें। इसके सेवन करने के बाद ऊपर से मट्ठा (लस्सी) पी लें। इससे संग्रहणी (दस्त) का रोग दूर हो जाता है।
• बेलगिरी, नागरमोथा, इन्द्रजौ, सुगंधबाला तथा मोचरस इन सभी को बकरी के दूध में डालकर पका लें। इसको छानकर पीने से संग्रहणी (दस्त) मिट जाता है।
• पके हुए बेल का शर्बत पुराने आंव की महाऔषधि है। इसके सेवन से बहुत जल्द ही संग्रहणी (दस्त) का रोग दूर हो जाता है।
• बेल (बेलपत्थर) का शर्बत बनाकर सेवन करने से संग्रहणी (दस्त) रोग ठीक हो जाता है।
• बेलगिरी, गोचरस, नेत्रबाला, नागरमोथा, इन्द्रयव, कूट की छाल सभी को लेकर पीसकर कपड़े में छान लें। इसको खाने से संग्रहणी (दस्त) के रोगी का रोग दूर हो जाता है।
► प्रवाहिका (पेचिश, संग्रहणी) :
• कच्ची बेल का गूदा, गुड़, तिल, तेल, पिप्पली, सौंठ आदि को बराबर मात्रा में मिलाकर मिश्रण तैयार करें। प्रवाहिका में जब पेट में गैस का दर्द हो और बार-बार मलत्याग की इच्छा हो और मल पूरा न होकर थोड़ा-थोड़ा आंव सहित आये तब 10-20 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम इस मिश्रण का प्रयोग करें। इससे लाभ होता है।
• बेल की गिरी और तिल को बराबर मात्रा में लेकर मिश्रण बनाकर, दही की मलाई या घी के साथ सेवन करने से प्रवाहिका रोग में लाभ होता है।
• 3 ग्राम कच्चे फल की मज्जा का चूर्ण तथा 2 ग्राम तिल को दिन में 2 बार पानी के साथ लेने से प्रवाहिका रोग में लाभ मिलता है।
13. बाल रोग : 5 से 10 मिलीलीटर कच्चे फलों की मज्जा तथा आंवले की गुठली के काढ़े को दिन में 3 बार सेवन करने से बालरोगों में लाभ मिलता है।
► आमातिसार :
• बेल के कच्चे और साबूत के फल को गर्म राख में भूनकर, उसको छिलके सहित पीसकर इसके रस को निकालकर इसमें मिश्री मिलाकर दिन में एक या दो बार लगातार 10-15 दिन तक सेवन सेवन करने से पुराना अतिसार (दस्त) ठीक हो जाता है।
• बेल की गिरी, कत्था, आम की गुठली की मींगी, ईसबगोल की भूसी और बादाम की मींगी को बराबर मात्रा में मिलाकर चीनी या मिश्री के साथ रोजाना 3-4 चम्मच सेवन करने से पुराने दस्त, आमातिसार तथा प्रवाहिका के रोग में लाभ मिलता है।
• बेल की गिरी और आम की गुठली की मींगी को बराबर मात्रा में पीसकर 2 से 4 ग्राम तक चावल के पानी के साथ या ठंडे पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से अतिसार (दस्त) ठीक हो जाता है।
• बेल (बेलपत्थर) का शर्बत रोजाना सुबह-शाम पीने से आमातिसार के रोग में लाभ मिलता है। बेल पत्थर के शर्बत में चीनी मिलाकर भी पीने से भी यह रोग दूर होता है।
• आमातिसार (आंवदस्त) के रोगी को बेल पत्थर के रस में, दही की मलाई, तिल का तेल और घी मिलाकर रोजाना सेवन कराने से जल्द आराम मिलता है।
► खूनी दस्त :
• 50 ग्राम बेल की गिरी के गूदे को 20 ग्राम गुड़ के साथ दिन में 3 बार खाने से खूनी अतिसार (दस्त) कम होता जाता है।
• चावल के 20 ग्राम पानी में 2 ग्राम बेल की गिरी का चूर्ण और 1 ग्राम मुलेठी के चूर्ण को पीसकर उसमें 3-3 ग्राम तिल, चीनी, और शहद को मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन कराने से पित्त रक्तातिसार मिट जाता है।
• 1-1 भाग बेल की गिरी और धनियां, 2 भाग मिश्री को एक साथ पीसकर चूर्ण बनाकर 2 से 6 ग्राम तक ताजे पानी से सुबह-शाम सेवन करने से लाभ मिलता है।
• कच्चे बेल को कंड़े की आग में भूनें, जब छिलका बिल्कुल काला हो जाये तब भीतर का गूदा निकालकर 10-20 ग्राम तक दिन में 3 बार मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से खूनी अतिसार ठीक हो जाता है।
• बेल के कच्चे फल को भूनकर या कच्चे फल को सुखाकर रोजाना सेवन करने से धीरे-धीरे खून कम होकर रक्तातिसार (खूनी दस्त) दूर हो जाता है।
• बेल के गूदे को गुड़ को मिलाकर सेवन करने से रक्तातिसार (खूनी दस्त) के रोगी का रोग दूर हो जाता है।
• बेलगिरी में गुड़ मिलाकर गोली बनाकर खाने से खूनी दस्त (रक्तातिसार) बंद हो जाते हैं।
► अतिसार (दस्त) :
• बेल के कच्चे फल को आग में सेंक लें, इसके 10-20 ग्राम गूदे को मिश्री के साथ दिन में 3-4 बार सेवन करने से अतिसार और आमातिसार कम होता है।
• 50 ग्राम सूखी बेल की गिरी और 20 ग्राम श्वेत कत्था के बारीक चूर्ण में 100 ग्राम मिश्री को मिलाकर लगभग डेढ़ ग्राम की मात्रा में दिन में 3-4 बार सेवन करने से सभी प्रकार के अतिसारों में लाभ मिलता है।
• 200 ग्राम बेल की गिरी को 4 लीटर पानी में पका लें। पकने पर जब एक लीटर के लगभग पानी बाकी रह जाए तब इस पानी को छान लें। फिर इसमें लगभग 100 ग्राम मिश्री मिलाकर बोतल में भरकर रख लें। इसको 10 से 20 ग्राम की मात्रा में 500 मिलीग्राम भुनी हुई सोंठ, अत्यधिक तेज अतिसार हो तो मूंग बराबर अफीम मिलाकर सेवन करने से 2-3 बार में लाभ होता है।
• 10 ग्राम बेल की गिरी के पाउडर को चावल के पानी के साथ पीसकर इसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर दिन में 2-3 बार देने से गर्भवती स्त्री का अतिसार (दस्त) ठीक हो जाता है।
• 5 ग्राम बेल की गिरी को सौंफ के रस में घिसकर दिन में 3-4 बार बच्चे को देने से बच्चे के हरे पीले दस्त ठीक हो जाते हैं।
• 1-1 ग्राम बेल की गिरी व पलाश का गोंद और 2 ग्राम मिश्री को मिलाकर थोड़े पानी के साथ पीसकर कम आग पर गाढ़ा करके चटाने से भी अतिसार में लाभ होता है।
► पित्त अतिसार :
बेल का मुरब्बा खिलाने से पित्त का अतिसार मिट जाता हैं। पेट के सभी रोगों में बेल का मुरब्बा खाने से लाभ मिलता है।
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Sunday, 29 January 2017
निर्धन एवं असहाय जन सहायता हेतु कंबल वितरण कार्यक्रम
निर्धन एवं असहाय जन सहायता हेतु कंबल वितरण कार्यक्रम
मकर संक्रांति का पावन पर्व पर शुभारंभ किए गए कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए, बलप्रदा परिवार के संरक्षक परम अदरणीय वैद्य श्री विजय पाल सिंह जी द्वारा निर्धन एवं असहाय जानो की सेवा एवं सुरक्षा के लिए कंबल वितरण किया गया। हम मानते हैं की असहायों की सेवा से बढ़ कर विश्व मे और दूसरा कोई पुण्य कर्म नहीं है ओर इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए हम इस क्रम को आगे बढ़ते जाएंगे तथा हम आप सभी का आवाहन करते हैं की आप भी आगे आयें तथा इस पुण्य के कार्य को अपने अपने स्तर से आगे बढ़ाएँ।
Saturday, 15 October 2016
गूलर के चमत्कारिक फायदे, (Kidney Failure, Liver Failure Treatment, Kidney Failure Ayurvedic Treatment at Balprada Ashram)
Balprada Jansewa Ashram TRUST
►पेचिश Dysentery : www.balpradagroup.com
गूलर की कोमल पत्तियों का 10 से 15 मिलीलीटर रस सेवन करें।
►कमजोरी, बल, वीर्य की कमी Weakness : www.balpradagroup.com
गूलर की छाल का पाउडर + मिश्री को बराबर मात्रा में मिलाकर रख लें।
इसे रोज़ दस ग्राम की मात्रा में दूध के साथ सेवन करें।
►शुक्राणुओं की कमी Low sperm count : www.balpradagroup.com
गूलर के दूध की 20 बूंदे + छुहारे के साथ खाने से शुक्राणु की संख्या बढ़ती है।
►सफ़ेद पानी/ श्वेत प्रदर Leucorrhoea : www.balpradagroup.com
गूलर के सूखे फल + मिश्री, को शहद के स्थ चाटने से लाभ होता है।
►प्रदर, प्रमेह Urinary disorders : www.balpradagroup.com
गूलर के ताज़े फल का रस + शहद/शक्कर, के साथ सुबह और शाम लेने से प्रदर में लाभ होता है।
►कफ, कफ की अधिकता Excessive cough : www.balpradagroup.com
गूलर के दूध latex को मिश्री + शहद के साथ, दिन में तीन बार खाएं।
►बच्चों का सूखा रोग : www.balpradagroup.com
गूलर का दूध, बताशे में रख कर खाने से लाभ होता है।
►ह्रदयविकार : www.balpradagroup.com
गूलर के पत्ते क रस नियमित पियें।
►लीवर के रोग, वात-विकार : www.balpradagroup.com
गूलर के पत्ते का रस नियमित पियें।
►प्रदर रोग Leucorrhoea, कमजोरी, वीर्यपात Spermatorrhea :
गूलर के पत्ते का रस एक कप की मात्रा मे नियमित पियें।
►जलने पर : www.balpradagroup.com
गूलर की पत्ती का लेप प्रभावित हिस्से पर लगायें।
►रक्त स्राव, चोट Bleeding : www.balpradagroup.com
खून निकलने पर पत्ते का रस प्रभावित हिस्से पर लगाने से खून का निकलना बंद होता है।
#स्वास्थ्य #आयुर्वेद #Ayurved #बलप्रदा #Balprada #Kidney #Liver #Cancer
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गूलर की कोमल पत्तियों का 10 से 15 मिलीलीटर रस सेवन करें।
►कमजोरी, बल, वीर्य की कमी Weakness : www.balpradagroup.com
गूलर की छाल का पाउडर + मिश्री को बराबर मात्रा में मिलाकर रख लें।
इसे रोज़ दस ग्राम की मात्रा में दूध के साथ सेवन करें।
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गूलर के दूध की 20 बूंदे + छुहारे के साथ खाने से शुक्राणु की संख्या बढ़ती है।
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गूलर के सूखे फल + मिश्री, को शहद के स्थ चाटने से लाभ होता है।
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गूलर के ताज़े फल का रस + शहद/शक्कर, के साथ सुबह और शाम लेने से प्रदर में लाभ होता है।
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गूलर के दूध latex को मिश्री + शहद के साथ, दिन में तीन बार खाएं।
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गूलर का दूध, बताशे में रख कर खाने से लाभ होता है।
►ह्रदयविकार : www.balpradagroup.com
गूलर के पत्ते क रस नियमित पियें।
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गूलर के पत्ते का रस नियमित पियें।
►प्रदर रोग Leucorrhoea, कमजोरी, वीर्यपात Spermatorrhea :
गूलर के पत्ते का रस एक कप की मात्रा मे नियमित पियें।
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गूलर की पत्ती का लेप प्रभावित हिस्से पर लगायें।
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खजूर के स्वास्थय लाभ, (Kidney Failure, Liver Failure Treatment, Kidney Failure Ayurvedic Treatment at Balprada Ashram)
खजूर में फाईबर, विटामिन ए, बी-कॉम्प्लेक्स, विटामिन के, ऑयरन, कॉपर, मैगनीशियम, मैगनीज़ आदि पोषक तत्व पाये जाते हैं।
खजूर से मिलने वाले स्वास्थय लाभ :-
►कब्ज़ में स्थाई आराम : कब्ज़ का मुख्य कारण होता है आँत में खुश्की होना और खजूर आँतों की खुश्की को पूरी तरह से खत्म करता है । खजूर के द्वारा कब्ज़ को पूरी तरह खत्म करने के लिये रोज सुबह दो-तीन खजूर को एक कटोरी ताजे पानी में डुबोकर रख दीजिये और रात होने तक रखा रहने दीजिये । रात को सोते समय इन खजूरों को खूब चबा चबा कर खा लीजिये । यह प्रयोग 7-15 दिनों तक लगातार कीजिये ।
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►वजन बढ़ानें में लाभकारी : खजूर में सभी पोषक तत्व तो पाये ही जाते हैं इसके अतिरिक्त यह कैलोरी और ग्लुकोज़ का भी बहुत अच्छा स्रोत है जिस कारण से यह दुबले-पतले लोगों में वजन बढ़ाने का काम कर सकता है । वजन बढ़ाने का लाभ उठाने के लिये14 साल से अधिक उम्र के लोग रोज पूरे दिन में 10-12खजूर खूब चबा चबा कर खायें ।
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►ऊर्जा देता है : खजूर में शरीर को तुरंत ऊर्जा देने की प्राकृतिक शक्ति होती है क्योंकि इसमें शुगर अधिक मात्रा में पायी जाती है । यह शुगर ग्लुकोज़ और फ्रक्टोज़ दोनों ही रूप में उप्लब्ध होती है । इस कारण से जब भी शरीर को अधिक ऊर्जा की जरूरत हो तो 2-3 खजूर खाकर ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।
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►नाड़ीतंत्र को मजबूत करे : शरीर का नाड़ीतंत्र सबसे ज्यादा उलझे हुये तंत्रों में माना जाता है । सम्पूर्ण शरीरेंद्रियों का मस्तिष्क के साथ सम्पर्क मुख्यतः नाड़ीतंत्र के द्वारा ही सम्भव हो पाता है । खजूर नाड़ीतंत्र का परम मित्र सिद्ध होता है । खजूर में उपलब्ध पोटाशियम नाड़ीतंत्र के लिये बहुत जरूरी होता है । साथ ही साथ यह रक्त्चाप को नियमित रखता है और हृदय को भी मजबूत करता है ।
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►खून की कमी दूर करे : खजूर में शरीर के लिये लाभकारी और शरीर द्वारा आसानी से स्वीकार किया जाने वाला ऑयरन तत्व पाया जाता है । अतः खून की कमी से परेशान लोगों के लिये खजूर वास्तव में किसी वरदान से कम नही है । रक्ताल्प्तता के रोगियों के लिये रोज दो बार 2-2खजूर खाना पर्याप्त होता है ।
#स्वास्थ्य #Health #आयुर्वेद #Ayurved #बलप्रदा #Balprada #Kidney #Liver#Cancer

खजूर से मिलने वाले स्वास्थय लाभ :-
►कब्ज़ में स्थाई आराम : कब्ज़ का मुख्य कारण होता है आँत में खुश्की होना और खजूर आँतों की खुश्की को पूरी तरह से खत्म करता है । खजूर के द्वारा कब्ज़ को पूरी तरह खत्म करने के लिये रोज सुबह दो-तीन खजूर को एक कटोरी ताजे पानी में डुबोकर रख दीजिये और रात होने तक रखा रहने दीजिये । रात को सोते समय इन खजूरों को खूब चबा चबा कर खा लीजिये । यह प्रयोग 7-15 दिनों तक लगातार कीजिये ।
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►वजन बढ़ानें में लाभकारी : खजूर में सभी पोषक तत्व तो पाये ही जाते हैं इसके अतिरिक्त यह कैलोरी और ग्लुकोज़ का भी बहुत अच्छा स्रोत है जिस कारण से यह दुबले-पतले लोगों में वजन बढ़ाने का काम कर सकता है । वजन बढ़ाने का लाभ उठाने के लिये14 साल से अधिक उम्र के लोग रोज पूरे दिन में 10-12खजूर खूब चबा चबा कर खायें ।
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►ऊर्जा देता है : खजूर में शरीर को तुरंत ऊर्जा देने की प्राकृतिक शक्ति होती है क्योंकि इसमें शुगर अधिक मात्रा में पायी जाती है । यह शुगर ग्लुकोज़ और फ्रक्टोज़ दोनों ही रूप में उप्लब्ध होती है । इस कारण से जब भी शरीर को अधिक ऊर्जा की जरूरत हो तो 2-3 खजूर खाकर ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।
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►नाड़ीतंत्र को मजबूत करे : शरीर का नाड़ीतंत्र सबसे ज्यादा उलझे हुये तंत्रों में माना जाता है । सम्पूर्ण शरीरेंद्रियों का मस्तिष्क के साथ सम्पर्क मुख्यतः नाड़ीतंत्र के द्वारा ही सम्भव हो पाता है । खजूर नाड़ीतंत्र का परम मित्र सिद्ध होता है । खजूर में उपलब्ध पोटाशियम नाड़ीतंत्र के लिये बहुत जरूरी होता है । साथ ही साथ यह रक्त्चाप को नियमित रखता है और हृदय को भी मजबूत करता है ।
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►खून की कमी दूर करे : खजूर में शरीर के लिये लाभकारी और शरीर द्वारा आसानी से स्वीकार किया जाने वाला ऑयरन तत्व पाया जाता है । अतः खून की कमी से परेशान लोगों के लिये खजूर वास्तव में किसी वरदान से कम नही है । रक्ताल्प्तता के रोगियों के लिये रोज दो बार 2-2खजूर खाना पर्याप्त होता है ।
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मिश्री (डेले वाली) के स्वास्थय लाभ, (Kidney Failure, Liver Failure Treatment, Kidney Failure Ayurvedic Treatment at Balprada Ashram)
मिश्री अपने स्वाद के लिए जितनी जानी जाती है उससे ज्यादा इसके फायदे हैं। जानिए कैसे इसे खाकर सेहत को लाभ होता है।
►गला खराब होने पर मिश्री को पानी में मिलाकर पिएं आराम मिलेगा। खराश होने पर थोड़ी सी मिश्री खाएं, खराश दूर होगी। www.balpradagroup.com
►मिश्री सेहत को फायदा पहुंचाने के साथ ताजगी भरी ड्रिंक के रुप में भी प्रयोग की जाती है। मिश्री को पानी में मिलाकर पिएं, इससे पाचन सही रहता है और तरावट भी मिलती है।www.balpradagroup.com
►मुंह के छाले होने पर मिश्री को इलायची के साथ मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को छाले पर लगाएं। झट दूर होंगे छाले।www.balpradagroup.com
►नकसीर होने पर मिश्री को पानी में मिलाकर सूघंने पर आराम मिलता है।www.balpradagroup.com
►केसर और दूध के साथ मिश्री का सेवन करने से यौन दुर्बलता का अंत होता है।www.balpradagroup.com
#स्वास्थ्य #आयुर्वेद #Ayurved #बलप्रदा #Balprada #Kidney #Liver #Cancer
►गला खराब होने पर मिश्री को पानी में मिलाकर पिएं आराम मिलेगा। खराश होने पर थोड़ी सी मिश्री खाएं, खराश दूर होगी। www.balpradagroup.com
►मिश्री सेहत को फायदा पहुंचाने के साथ ताजगी भरी ड्रिंक के रुप में भी प्रयोग की जाती है। मिश्री को पानी में मिलाकर पिएं, इससे पाचन सही रहता है और तरावट भी मिलती है।www.balpradagroup.com
►मुंह के छाले होने पर मिश्री को इलायची के साथ मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को छाले पर लगाएं। झट दूर होंगे छाले।www.balpradagroup.com
►नकसीर होने पर मिश्री को पानी में मिलाकर सूघंने पर आराम मिलता है।www.balpradagroup.com
►केसर और दूध के साथ मिश्री का सेवन करने से यौन दुर्बलता का अंत होता है।www.balpradagroup.com
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Saturday, 1 October 2016
Monday, 26 September 2016
लौंग के लाभ (Benefits of Clove)
मसाले के रूप में प्रयोग होने वाली लौंग औषधीय गुणों का भंडार है। इसमें प्रोटीन, आयरन, कार्बोहाइड्रेट्स, कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोटैशियम, सोडियम और हाइड्रोक्लोरिक एसिड भरपूर पाया जाता हैं। इसमें विटामिन 'ए', 'सी', मैगनीशियम और फाइबर भी पाया जाता है।
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दांत दर्द से राहत :
लौंग को प्राकृतिक दर्द निवारक कहा जाता है। इसमें एंटीबैक्टीरियल गुण भी पाए जाते हैं। लौंग का तेल दांत दर्द से आराम दिलाने में बहुत ही लाभदायक होता है। लौंग का तेल लगाने से दर्द छूमंतर हो जाता है। दर्द के समय अगर एक लौंग मुंह में रख लें और उसके मुलायम होने के बाद उसे हल्के-हल्के चबाएं तो दांत दर्द ठीक हो जाता है।www.balpradagroup.com
अर्थराइटिस में आराम :
लौंग में फ्लेवोनॉयड्स भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसलिए यह जोड़ों में होने वाले दर्द व सूजन से आराम दिलाने में बहुत फायदेमंद होता है। कई अरोमा एक्सपर्ट अर्थराइटिस के उपचार के लिए लौंग के तेल की मालिश की सलाह देते हैं। www.balpradagroup.com
लौंग में फ्लेवोनॉयड्स भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसलिए यह जोड़ों में होने वाले दर्द व सूजन से आराम दिलाने में बहुत फायदेमंद होता है। कई अरोमा एक्सपर्ट अर्थराइटिस के उपचार के लिए लौंग के तेल की मालिश की सलाह देते हैं। www.balpradagroup.com
श्वाससंबंधी रोगों का इलाज :
लौंग की पांच कलियों को पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इसमें शहद मिलाकर दिन में तीन बार पीने से अस्थमा रोगी को काफी लाभ होता है। साथ ही लौंग के तेल का अरोमा भी श्वास रोगों से राहत दिलाने में मददगार होता है। इसे सूंघने मात्र से ही जुकाम, कफ, दमा, ब्रोंकाइटिस, साइनसाइटिस आदि समस्याओं में तुरंत राहत मिलती है।www.balpradagroup.com
लौंग की पांच कलियों को पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इसमें शहद मिलाकर दिन में तीन बार पीने से अस्थमा रोगी को काफी लाभ होता है। साथ ही लौंग के तेल का अरोमा भी श्वास रोगों से राहत दिलाने में मददगार होता है। इसे सूंघने मात्र से ही जुकाम, कफ, दमा, ब्रोंकाइटिस, साइनसाइटिस आदि समस्याओं में तुरंत राहत मिलती है।www.balpradagroup.com
सिर दर्द से मिलेगी राहत :
सिर दर्द मे लौंग को पीसकर माथे पर लगायें। इससे आपको फौरन फायदा होगा। लौंग का तेल भी दर्द में फायदेमंद होता है। नारियल के तेल में लौंग तेल की कुछ बूंदे मिलाकर सिर पर मालिश करने से दर्द दूर होता है। www.balpradagroup.com
सिर दर्द मे लौंग को पीसकर माथे पर लगायें। इससे आपको फौरन फायदा होगा। लौंग का तेल भी दर्द में फायदेमंद होता है। नारियल के तेल में लौंग तेल की कुछ बूंदे मिलाकर सिर पर मालिश करने से दर्द दूर होता है। www.balpradagroup.com
बेहतरीन एंटीसेप्टिक है त्वचा विकारो के लिए :
लौंग में मौजूद एंटीसेप्टिक गुणों के कारण इसका इस्तेमाल फंगल संक्रमण, खुजली, कटने, जलने, घाव हो जाने या त्वचा संबंधी अन्य समस्याओं के उपचार में काफी उपयोगी होता है। लेकिन लौंग का तेल इस्तेमाल करते हुए हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि तेल को किसी तेल में मिलाकर ही त्वचा पर लगाना चाहिए। www.balpradagroup.com
लौंग में मौजूद एंटीसेप्टिक गुणों के कारण इसका इस्तेमाल फंगल संक्रमण, खुजली, कटने, जलने, घाव हो जाने या त्वचा संबंधी अन्य समस्याओं के उपचार में काफी उपयोगी होता है। लेकिन लौंग का तेल इस्तेमाल करते हुए हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि तेल को किसी तेल में मिलाकर ही त्वचा पर लगाना चाहिए। www.balpradagroup.com
पाचन शक्ति मजबूत बनाए :
लौंग के सेवन से पाचन संबंधी समस्याओं से निजात मिलती है। इससे पाचन शक्ति बढ़ती है। साथ ही लौंग खाने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं। भोजन में प्रतिदिन दो लौंग का सेवन करने से हाजमा और पाचन तंत्र दुरुस्त रहते हैं। www.balpradagroup.com
लौंग के सेवन से पाचन संबंधी समस्याओं से निजात मिलती है। इससे पाचन शक्ति बढ़ती है। साथ ही लौंग खाने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं। भोजन में प्रतिदिन दो लौंग का सेवन करने से हाजमा और पाचन तंत्र दुरुस्त रहते हैं। www.balpradagroup.com
जी मिचलाये तो अपनाएं :
उलटी होने पर भुनी लौंग के पाउडर को शहद में मिला कर सेवन करने से तत्काल लाभ होता है। यदि जी मिचला रहा हो तो 2 लौंग पीसकर एक चम्मच शक्कर में थोड़ा-सा पानी मिलाकर उबाल लें व ठंडा कर लें। इसे पीने से जी मिचलाना बंद हो जाता है। साथ ही यह गर्भ ठहरने के दौरान होनी वाली जी मिचलाने की समस्या में उपयोगी होता है।www.balpradagroup.com
उलटी होने पर भुनी लौंग के पाउडर को शहद में मिला कर सेवन करने से तत्काल लाभ होता है। यदि जी मिचला रहा हो तो 2 लौंग पीसकर एक चम्मच शक्कर में थोड़ा-सा पानी मिलाकर उबाल लें व ठंडा कर लें। इसे पीने से जी मिचलाना बंद हो जाता है। साथ ही यह गर्भ ठहरने के दौरान होनी वाली जी मिचलाने की समस्या में उपयोगी होता है।www.balpradagroup.com
रक्त शोधक है लौंग :
डायबिटीज से पीडि़त लोगों के लिए लौंग लाभकारी होता है। यह ना केवल रक्त को शुद्ध करता है, बल्कि ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में भी मददगार होता है। लौंग का सेवन प्रतिरोधी क्षमता को भी बढ़ाता है।
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डायबिटीज से पीडि़त लोगों के लिए लौंग लाभकारी होता है। यह ना केवल रक्त को शुद्ध करता है, बल्कि ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में भी मददगार होता है। लौंग का सेवन प्रतिरोधी क्षमता को भी बढ़ाता है।
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